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निष्पक्ष, पारदर्शी और फ्रेंडली हो पुलिसिंग-आर.के.चतुर्वेदी (IPS )
July 29, 2019 • Pradeep Kumar Tiwari

कानपुर भारतीय पुलिस और उसकी कार्यप्रणाली पर अक्सर सवाल उठते रहते है। भारतीय समाज के बदलते परिवेश और परिस्थितियों के चलते वर्तमान पुलिस व्यवस्था कितनी कारगर हैं और पुलिस की सफलता तथा असफलता का क्या प्रतिशत है यह बहस का मुद्दा हो सकता है लेकिन परिस्थितियों के अनुसार पुलिस का कार्य व्यवहार कैसा होना चाहिये इस पर पुलिस उपमहा निरीक्षक कानपुर परिक्षेत्र  आर. के. चतुर्वेदी का स्पष्ट मानना है कि हम आज भी जिस पुलिस प्रारूप और एक्ट पर काम कर रहे है। वह वर्तमान परिस्थितियों के लिये नाकाफी है, उनका यह भी मानना है कि वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों में किसी भी राज्य की पुलिस पूरी तरह से प्रोफेशनल हो गयी है इस लिये यह कहना कि सारा दोष पुलिस कर्मियों का है गलत है। इस सम्बन्ध में हमारे एडिटर इन चीफ डा0 प्रदीप तिवारी ने डीआईजी से मुलाकात की। मुलाकात का सार यह था कि पुलिस व्यवस्था में व्यापक सुधार की सम्भावनाओं के साथ ही यह भी जरूरी है कि पुलिस की इकोफ्रेन्डली छवि को सुधारने के लिये सामाजिक प्रयास भी जरूरी है क्योंकि पुलिस कर्मी भी इसी समाज का एक अंग है प्रस्तुत है डीआईजी से बातचीत के मुख्य अंश.........

बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ जनता की पुलिस की खौफनाक तस्वीर, पीड़ित का थाने में जाने से डरना और क्षेत्रीय समस्याओं को लेकर इलाकाई पुलिस की उदासीनता के सवाल के साथ इस पर श्री चतुर्वेदी का मानना है कि पुलिस आज भी 1861 के पुलिस एक्ट और 1872 के पुलिस रेग्यूलेशन पर काम कर रही हैं जिसकी वजह से हमारी पब्लिक से मित्र होने की छवि नहीं बन पायी और पुलिस का एक खौफनाक चेहरा आज भी कायम है उनका कहना था कि इस डर को दूर करने के लिए मैंने अपनी लखनऊ में तैनाती के दौरान थाने आने वाले पीड़ित पक्ष को उसकी तहरीर पर रसीद देने की व्यवस्था शुरू की थी जिसे पीली पर्ची का नाम दिया गया था। इस पर्ची से पीड़ित पक्ष को मानसिक रूप से यह संतोष होता था कि थाने में उसकी सुनी गयी। मेरे लखनऊ से स्थानान्तरण होने तक सभी थानों से लगभग 40,000 पर्चियां जारी की जा चुकी थी यही प्रयास मैंने कानपुर में भी शुरू किया है।

सामान्य तौर पर यह आम धारणा है कि पुलिस विभाग में आपसी सामन्जस्य की कमी रहती है इस सवाल पर उनका कहना था कि जरूरी यह है कि किसी मामले में जवाबदेही नीचे से लेकर ऊपर तक सुनिश्चित होनी चाहिये। सिपाही स्तर से लेकर थानाध्यक्ष तक तो अधिकारी अपनी पकड़ बनाये रखते हैलेकिन पुलिस उपाधीक्षक स्तर पर यह नहीं हो पाता हैं। अगर बीट के सिपाही से उसके क्षेत्र में हुई किसी घटना के सम्बन्ध में जवाब तलब किया जा सकता है तो यही सवाल पुलिस उपाधीक्षक स्तर पर भी किया जा सकता है। उनका कहना था कि पलिस का कार्य एक टीम वर्क है किसी व्यक्ति विशेष पर सारी जिम्मेदारी का बोझ नहीं डाला जा सकता। अगर टीम वर्क मजबूत होगा तो मैं दावे से कह सकता हूँ कि न केवल अपराधों में कमी आयेगी बल्कि पुलिस की छवि में भी सुधार आयेगा।

मुम्बईयां फिल्मो के चर्चित सवांद "बेटा सो जा नहीं तो गब्बर आ जायेगा' की तर्ज पर आज समाज में लोग अपने बच्चों को बचपन में ही यह कहकर डराते है कि शांत हो जाओ वरना पुलिस आ जायेगी जिससे उस अपरिपक्व मन में पुलिस के प्रति एक गलत और घृणा भरी सोच पनपने लगती है जो धीरे-धीरे बलवती होकर हमेशा के लिये उसके मन में बस जाती है। डीआईजी चतुर्वेदी ने इस सवाल पर कहा कि पुलिस की छवि को बदलने का लगातार प्रयास किया जा रहा है उन्होंने यह भी कहा कि थाने में पीड़ित की मनवाई नहीं होने की स्थिति से बचने के लिये मुख्यमंत्री के निर्देश पर प्रदेश के सभी जनपदों में 100 नम्बर और महिला उत्पीड़न के लिये 1090 नम्बर के टेलीफोन सूचना देने की व्यवस्था की गयी और इसके बेहद अच्छे परिणाम मिले है। अब तक एक लाख से ऊपर शिकायतें दर्ज की जा चुकी है यह पूछे जाने पर की अगर आपके स्तर पर सबकुछ ठीक है तो थाना स्तर पर क्यों दिक्कत आ रही है, उन्होंने कहा कि प्रबंधन के सिद्धान्त में सबसे महत्वपूर्ण है कस्टमर सेटिस्फेक्शन जिसके तहत हम पीडित को उसके प्रार्थना पत्र के बदले एक कागज दे रहे है जिसका अर्थ है कि उसकी शिकायत स्वीकार कर ली गयी है रसीद जारी होने के बाद प्रार्थना पत्र को रजिस्टर पर चढ़ाना आवश्यक है उस स्थिति में शिकायत को नजर अन्दाज नहीं किया जा सकता क्योंकि पीडित को दी गयी रसीद इस बात का प्रमाण होगी कि प्रार्थना पत्र थाने में दिया गया है।

अपराध और अपराधियों के हाइटेक होने के सवाल पर उन्होंने कहा कि यह सही है कि आज के अपराधी संगठित होकर अत्याधुनिक टेक्नालॉजी का प्रयोग कर रहे हैं लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि पुलिस इस मामले में उनसे पीछे है। हमारे पास संसाधनों की कमी अवश्य है लेकिन शासन स्तर पर पुलिस विभाग को हाइटेक करने के लिये हर सम्भव प्रयास जारी है जिसका प्रमाण है कि कानपुर नगर में खोला गया अत्याधुनिक पुलिस कन्ट्रोल रूम, उन्होंने यह भी कहा कि अत्याधुनिक संसाधनों का प्रयोग करने से पुलिस के कार्य में निश्चित रूप से गति आयेगी लेकिन इसे लेकर हमें अपनी बेसिक पुलिसिंग को नहीं छोड़ना चाहिएउन्होंने कहा कि चौराहे पर चेकिंग आज भी उतनी हा कारगर है |जतना पहल हुआ करता था ही कारगर है जितनी पहले हुआ करती थी जरूरत इस बात की है कि नई टेक्नालॉजी और बेसिक पुलिसिंग में समन्वय बनाकर काम किया जाये। अपराध के रूप में प्रदेश का कौन सा जनपद सबसे ज्यादा कठिन है इस सवाल पर उन्होंने कहा कि हर शहर की अपनी समस्याये है कहीं भी अपराध एक की अपनी समस्यायें है कहीं भी अपराध एक जैसा होना सम्भव नही हैं प्रदेश के पूर्वी पश्चिमी क्षेत्रों के जनपदों में स्थितियां मध्य पश्चिमी क्षेत्रों के जनपदों में स्थितियां मध्य उत्तर प्रदेश के विपरीत है। कहीं क्षेत्रीय अपराधी हावी है तो कहीं नक्सलवाद और कहीं समाजिक अथवा संगठित गिरोह के अपराध ज्यादा है। कानपुर औद्योगिक नगर होने तथा सर्वाधिक जनसंख्या वाला शहर होने के कारण यहां की समस्यायें अलग तरह की हैं लेकिन एक सक्षम पुलिस अधिकारी को इन समस्याओं से लड़ने की ही ट्रेनिंग और शपथ दिलायी जाती है।                                       

 अपने कैरियर के सम्बंध में श्री चतुर्वेदी नेबताया कि वह मूलरूप से मिर्जापुर उत्तर प्रदेश के रहने वाले है और प्रारम्भिक विद्यालय से पास की। परिवार में बड़े भाई के पुलिस में होने से प्रेरणा लेकर इस क्षेत्र में आये डीआईजी ने बताया कि उन्होंने पुलिस में उपाधीक्षक पद से अपने कैरियर की शुरूआत की। प्रदेश के कई शहरों में रहने के बाद 1996 में अपरपुलिस अधीक्षक के पद पर पदोन्नति होने के बाद वह नोएडा. मुजफ्फनगर, गाजियाबाद, मथुरा आदि शहरों में पुलिस अधीक्षक पद पर रहेतदोपरान्त वह केन्द्र में चले गये और इण्डियन कार्पोरेशन के विजिलेन्स विभाग में नार्दन इण्डिया के मुखिया रहे वहॉ से लौटने के बाद उन्हें आईपीएस कैडर मिला और फिर चन्दौली, सहारनपुर, मथुरा, नोएडा, सुल्तानपुर, इटावा, एटा, फैजाबाद सहित अन्य जनपदों में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात रहे और पुनः पदोन्नति के बाद आज डीआईजी कानपुर के पद में तैनात है। उन्होंने बताया कि परिवार में उनकी पत्नी और एक बेटी है जो पुना में ए एलएलबी कर रही हैअपने कैरियर की सफलता के प्रमाण का जिक्र करते हुये उ उन्होंने कहा कि उन्हें अबतक कुल चार मैडल मिले है। यह चार प्रसिडेंट ऑफ गैलेन्टरी मैडल, प्रसिडेंट ऑफ लॉग एण्ड ग्लोरियस सर्विसेस मैडल, इण्डिपेडेन्स डे मैडल, प्राइमिनिस्टर डे मैडल है।